मधुबनी : बलिराजगढ़ उत्खनन कार्य की प्रगति की जिलाधिकारी ने की वर्चुअल समीक्षा - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शनिवार, 4 जुलाई 2026

मधुबनी : बलिराजगढ़ उत्खनन कार्य की प्रगति की जिलाधिकारी ने की वर्चुअल समीक्षा

  • उत्खनन कार्य को पूरी वैज्ञानिक पद्धति एवं गुणवत्ता के साथ निर्धारित समय-सीमा में आगे बढ़ाने का दिया निर्देश।

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मधुबनी (रजनीश के झा), 04 जुलाई । जिलाधिकारी ने शनिवार को वर्चुअल माध्यम से बलिराजगढ़ में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संचालित  उत्खनन कार्य की प्रगति की विस्तृत समीक्षा की। बैठक में उत्खनन कार्य की वर्तमान स्थिति, प्राप्त पुरातात्विक अवशेषों तथा आगामी कार्ययोजना पर विस्तार से चर्चा करते हुए संबंधित अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए। जिलाधिकारी ने कहा कि बलिराजगढ़ न केवल बिहार, बल्कि पूरे देश की महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहर है। यहां हो रही वैज्ञानिक खुदाई से मिथिला की प्राचीन सभ्यता, सांस्कृतिक समृद्धि तथा ऐतिहासिक विरासत से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ रहे हैं। उन्होंने उत्खनन कार्य को पूरी वैज्ञानिक पद्धति एवं गुणवत्ता के साथ निर्धारित समय-सीमा में आगे बढ़ाने का निर्देश दिया। ज्ञातव्य है कि  बाबूबरही प्रखंड के भूपट्टी एवं पचरुखी पंचायत की सीमा में स्थित इस स्थल को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है। वर्तमान में यहां चरणबद्ध वैज्ञानिक उत्खनन कार्य जारी है, जिससे मिथिला के प्राचीन इतिहास के अनेक अनसुलझे अध्यायों से पर्दा उठने की संभावना है।


वर्तमान उत्खनन की प्रमुख उपलब्धियां

वर्तमान में कुल 06 ट्रेंच (खाइयों) में उत्खनन कार्य जारी है, जिनमें तीन ट्रेंच किलेबंदी (Fortification Area) तथा तीन ट्रेंच किले की दक्षिण दिशा में लगभग 200 मीटर दूरी पर स्थित क्षेत्र में संचालित हैं। किलेबंदी क्षेत्र में उत्खनन के दौरान प्राचीन ईंट निर्मित विशाल परकोटे (Fortification Wall) एवं फर्श के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इसके साथ ही पत्थर के गोले, मिट्टी के बर्तन, नॉर्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर (NBPW) सहित अनेक महत्वपूर्ण पुरावशेष प्राप्त हुए हैं, जो उस समय की विकसित शहरी संस्कृति का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। दक्षिणी क्षेत्र के एक ट्रेंच में 5.40 मीटर गहराई तक खुदाई में 13 परतों वाला रिंग वेल (Ring Well) प्राप्त हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार इसका उपयोग जल संग्रहण, अन्न भंडारण अथवा घरेलू कार्यों के लिए किया जाता रहा होगा। यहां से मानव एवं पशु आकृतियों की टेराकोटा प्रतिमाएं, खिलौना गाड़ी, मनके, स्लिंग बॉल, ब्लैक स्लिप्ड वेयर तथा अन्य प्राचीन सामग्री प्राप्त हुई है। एक अन्य ट्रेंच में प्राचीन जल निकासी प्रणाली (Drainage System) एवं सोख्ता गड्ढा (Soak Pit) का अनावरण हुआ है। यहां से मुहरें (Seals), सीलिंग, टेराकोटा मानव एवं पशु प्रतिमाएं, मनके, पत्थर एवं टेराकोटा स्लिंग बॉल सहित अनेक पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। इसके अतिरिक्त रेड वेयर, ब्लैक वेयर, ब्लैक स्लिप्ड वेयर, ग्रे वेयर तथा नॉर्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर जैसी पांच अलग-अलग मृदभांड परंपराएं मिली हैं, जो इस क्षेत्र में विभिन्न सांस्कृतिक कालखंडों में निरंतर मानव बसावट का सशक्त प्रमाण हैं।


एक अन्य ट्रेंच में सात परतों वाली ईंट निर्मित संरचना भी प्राप्त हुई है, जिसकी लंबाई लगभग 3.80 मीटर तथा चौड़ाई 2.60 मीटर है। करीब तीन हजार वर्ष पुरानी विकसित नगरी के भी संकेत मिले है। पुरातत्वविदों के अनुसार बलिराजगढ़ से प्राप्त प्रारंभिक सांस्कृतिक साक्ष्य लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व तक के हैं। अब तक प्राप्त विशाल किलेबंदी, रिंग वेल, उन्नत जल निकासी प्रणाली, ईंट निर्मित स्थापत्य, मुहरें, टेराकोटा प्रतिमाएं तथा पांच प्रकार की मृदभांड परंपराएं यह स्पष्ट संकेत देती हैं कि बलिराजगढ़ लौह युग से प्रारंभिक ऐतिहासिक काल तक लगभग एक हजार वर्षों तक आबाद रहने वाला एक सुव्यवस्थित एवं समृद्ध शहरी केंद्र रहा होगा। बलिराजगढ़ में जारी यह उत्खनन न केवल मिथिला के गौरवशाली अतीत को नई पहचान देगा, बल्कि राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस ऐतिहासिक धरोहर को नई प्रतिष्ठा प्रदान करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध होगा।

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